'जब अहिन्दी भाषियों ने हिन्दी को अपनी कलम की ताकत बनाया, तब जाकर हिन्दी पत्रकारिता सही मायने में 'राष्ट्रीय' बनी। यह किताब उन नायकों की वंदना है जिन्होंने भाषा को सरहदों में नहीं, बल्कि संवेदनाओं में जिया।'हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और भाषाई एकता के संघर्ष की एक गौरवशाली गाथा है। इस विकास यात्रा में उन 'हिन्दीतर' मनीषियों का योगदान अतुलनीय है, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी, फिर भी जिन्होंने हिन्दी को अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और उसे पत्रकारिता के शिखर पर प्रतिष्ठित किया।